*✍️रामलाल साहनी*
*बचपन की पिचकारी*
*🙏मां,बापू जी को समर्पित🙏*
बचपन की वह पिचकारी ।
जिसे खरीदने में थी लाचारी ।।
मां, बाबू जी थे गरीब,
फिर भी इच्छा पूरी की सारी।
बचपन की वह पिचकारी...
जिसे खरीदने में थी लाचारी.
सात रुपए की आती थी,
बोतल में भरी जाती थी।
थी स्टील की, थोड़ा सा,
पाइप भी लगाई जाती थी।
कुछ ऐसी ही थी वह पिचकारी,
जिसे खरीदने में थी लाचारी।
होली में पिचकारी नही आया था,i
रो_रो कर खूब मैं छैलाया था।
सात रुपए की बजाय
सिर्फ पांच रुपए ही पाया था।
नहीं समझ सका था उस समय
बचपन की वह पिचकारी,
जिसे खरीदने में थी लाचारी।
भले नहीं बनते थे घर पर,
गुझिया,पापड़ और पुड़ी
होली से पहले दिलाते थे
नए कपड़े,रंग और पुचकी
मां,बापू के द्वारा ही मिलती थी,
बचपन में मनचाही त्योहारी।
बचपन की वह पिचकारी,
जिसे खरीदने में थी लाचारी।
नहीं लगाया था रंग, फिर भी
आंसुओं से चेहरा धोया हूं,
आज आप दोनो की याद में
खूब जी भर कर रोया हूं।
जब नहीं है पास आप दोनों
अब बतानी है अपनी दुखसारी।
बचपन की वह पिचकारी,
जिसे खरीदने में थी लाचारी
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