Monday, 2 December 2024

पहले विवाह में छोटे बच्चों के छोटे गुलाब जामुन

पहले शादी में नहीं मिलते थे बच्चों को बड़ा गुलाब जामुन, प्याज और अचार 


आज से करीब पच्चीस वर्ष पहले जब गांव में शादी हुआ करता था तो कई गांव गांव में पता चलता था कि फला गांव में फला आदमी के बेटी अथवा बेटे की शादी है। इसलिए सबको खुशी होती थी उससे अधिक खुशी बच्चों को होती थी क्योंकि शादी में सबसे ज्यादा आनंद बच्चे ही उठाते थे। अब क्योंकि हम लोग छोटे होते थे इसलिए कोई हम लोगों पर ध्यान नहीं देता था और हम लोग मनमानी कुछ भी करते थे। जैसे घर पर न्योता मिला हो या नहीं मिला हो लेकिन वहां जाकर शादी के मटीमंगरा और भत्त्वान को मंसूर की दाल भात तथा प्याज, आम का आचार, बरा और दो पुड़ी तथा कढ़ी मिलता था। 

अब बच्चें है तो, बड़े कहते बच्चों को प्याज और बरा नहीं देना है 

जब विवाह में खाने के लिए लोग बैठते थे तो उस समय बच्चों की अलग ही पंक्ति लगाई जाती थी और उस समय सारा अत्याचार बच्चों पर ही होते थे( हास्य) जैसे बच्चों को मटी मंगरा वाले दिन और भत्तवान वाले दिन बच्चों को बरा और प्याज तथा अचार नहीं दिया जाता था यही नहीं बच्चों को कुछ मांगने पर कोई सुनता नहीं था और बड़े शादी विवाह में तेज आवाज में कोई कुछ नहीं मांगते थे क्योंकि उसमें लोगों को लगता था कि वह सभ्य व्यक्ति नहीं है।

अब उस समय जब बच्चें तेज तेज चिल्लाते थे कक्का ही हमई भांत दें ई द तब बच्चों की चिल्लाहट से झल्ला कर खाना बांटने वाला गुस्सा कर कहता नहीं है। 

जब किसी से दुश्मनी निकालनी होती थी तो शादी में खाना बच्चों को भी ढेर ढेर दिया जाता था

जब गांव में किसी से लड़ाई अथवा दुश्मनी निकालनी होती थी तो शादी में वह खाना बांटने लगते और खाना खत्म हो जाए इसलिए बच्चों को भी खूब ढेर ढेर खाना परोस दिया जाता था यही नहीं तब बच्चों को प्याज और बरा भी मिल जाता था, सब्जी भी। क्योंकि सब्जी अक्सर विवाह वाले ही दिन बनते थे।


पहले घूर में फेंकते थे घर का सारा कूड़ा, करकट और नर्दावा का पानी भी घूर में ही फेंकते थे। हर घर में एक नर्दावा रहता था पहले की बेसिन वही होता था और रोज सुबह सुबह महिलाएं उसमें से पानी निकालकर घूर में फेंकते थे

बच्चों को खाने की पंक्ति अलग होती थी, बच्चें अपनी पतरी और पुरवा स्वयं उठाते थे, घूर में पुरवा फेंकते समय पुरवा का निशाना लगाकर दूसरे पुरवा पर ही फेंकता था।

बच्चें अपनी पीने वाला मिट्टी का पात्र पुरवा खाने के लिए रखा पात्र पतरी स्वयं उठाते और बड़े खाकर उठकर चले जाते थे। जब बच्चों को उस समय पंक्ति में बैठाया जाता था तो बच्चों की पंक्ति खा लेती थी तो वह अपना पतरी और पुरवा साथ में उठाते थे और जिसके पतरी में खाना छुटा होता था तो वह पतरी को उठाकर सीधे अपने घर ले जाता था और जो पूरा पतरी चट करके खाता था वह अपनी पतरी और पुरवा नीचे गांव के घूर में फेंक देता और पुरवा को भी दूसरे पुरवा को निशाना लगाकर फेंकता था।


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